29 और 30 नवंबर को भारत के कई किसान संगठन दिल्ली में 'संसद मार्च' करेंगे.
ये संगठन किसानों को कृषि क़र्ज़ से मुक्ति दिलाने संबंधी क़ानून पास कराने की मांग के साथ दिल्ली आएंगे.
बीते कुछ वक़्त में अलग-अलग राज्यों के किसान ऐसे कई प्रदर्शन कर चुके हैं. माना जा रहा कि काफ़ी संख्या में किसान 'संसद मार्च' के लिए दिल्ली आ सकते हैं.
ऐसे में ये सवाल है कि आख़िर इन किसानों की मांग क्या है और क्यों ज़मीन पर हल चलाने वाले किसानों को बार-बार दिल्ली आना पड़ रहा है?
ऐसे ही सवालों के जवाब और किसानों के मौजूदा हालात पर बीबीसी संवाददाता अभिजीत कांबले ने जाने-माने पत्रकार पी साईनाथ से ख़ास बातचीत की.
किसानों के विरोध प्रदर्शन बेहद सकरात्मक हैं. आप इसे कुछ यूं समझ सकते हैं कि 20 सालों के नैतिक पतन से क्या मिलता है? आत्महत्याएं.
विरोध प्रदर्शन करने से क्या मिलता है? लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल हो पाता है.
आपको क्या चाहिए? किसानों की आत्महत्याएं या लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल?
किसानों के प्रदर्शनों पर सरकार क्या करेगी, ये नहीं मालूम.
मौजूदा सरकार ने 2014 में वादा किया कि स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिश को 12 महीने में मानेंगे. इसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत प्लस 50 फ़ीसदी देने का वादा शामिल था.
12 महीने के भीतर 2015 में यही सरकार कोर्ट और आरटीआई में जवाब देती है कि हम ये नहीं कर सकते हैं, ये बाज़ार को प्रभावित करेगा.
किसानों की पूरी दुनिया बिगड़ रही है, इसकी परवाह किसी को नहीं है. 2016 में कृषि मंत्री राधामोहन ये कहते हैं कि ऐसा कोई वादा कभी नहीं किया गया.
पांच साल की मोदी सरकार के छह बयान
कुछ दिन पहले नितिन गडकरी ने कहा था कि कोई उम्मीद नहीं थी कि हम चुनाव जीतेंगे, इसलिए बहुत सारे वादे कर दिए गए.
अब आप मध्य प्रदेश का कृषि मॉडल देख लीजिए. शिवराज सिंह चौहान स्वामीनाथन आयोग से भी आगे चले गए.
2018 में बजट के भाषण का पैराग्राफ नंबर 13 और 14 पढ़िए. इस भाषण में जेटली ने कहा, ''हां, हमने वादा किया और वादा पूरा कर दिया.''
अब पांच साल में ये सरकार छह अलग-अलग बयान दे रही है. अब ये सरकार आगे क्या करेगी? कुछ कहा नहीं जा सकता.
किसान जो मांग रहा है, वो कितनी लोकतांत्रिक मांगें हैं. हमारी संसद किसानों के लिए भी काम करनी चाहिए. सिर्फ़ कॉर्पोरेट्स के लिए नहीं काम करनी चाहिए.
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